अभी भी याद है वो
दिन जब हम अपनी कक्षा में अक्सर “मेरा भारत महान” पर निबंध लिखा करते थे। वो दिन याद करके चेहरे पर मुस्कान
आ जाती है जब हम 15 अगस्त और 26 जनवरी को स्कूल इसलिए जाते थे क्योंकि मिठाई बंटती
थी.। तब हमारी स्वतंत्रता ही देश की आजादी हुआ करती थी। इन सब के बावजूद भी तब
हमारी देशभक्ती और देशप्रेम में ज्यादे पारदर्शीता थी, क्योंकि तब हम दुनिया के
रस्मों-रिवाजों से अंजान थे। होली हो या मुहर्म, दिपावली हो या ईद हमें समान खुशी होती
थी क्योकिं हमें दोनों त्योहारों पर छुट्टी मिलती थी। तब हमारा ना कोई धर्म होता
था और ना ही मज़हब, जो मिलता उसी के साथ खेल लिया करते थे। अब हम बड़े हो गए समाज
के रस्मों-रिवाज में बंध गए। बचपन के उस निस्वार्थ भाव कि जगह अब सामाजिक
विसंगतियों ने ले ली।हमारे विचारों को आडम्बर और विडम्बनाओं की बेड़ियों ने जकड़
लिया। आज मानवता और देशभक्ती केवल दो जगह देखने को मिलती है,एक क्रिकेट के मैदान
में और हमारे राजनेताओं की भाषणों में। इस महान देश की एकता और अखंण्डता कहीं गुम
सी हो गयी है “वतन की जो हालत सुनाने लगेंगे तो पत्थर भी आंसू बहाने लगेंगे कहीं भीड़ में खो
गयी आदमीयत इसे ढ़ुढ़ने में ज़माने लगेंगे”। आज ज़रूरत है तो हमें अपने अन्दर गुम हो चुकी
उस आदमीयत को ढ़ुढ़ने की, आजादी के बाद भी जकड़े इन बेड़ियों से मुक्त होने की। देश को महान बनाने
के लिए पहले खुद को और अपने समाज को निखारने की ज़रूरत है। तब जा कर कहीं हमारा
भारत महान होगा।