जी हां सुनने में ये शायद
थोड़ा अजीब लगे, लेकिन हमारे देश का कड़वा सच है।कश्मीर के प्रति कटुता और क्रिकेट
में समान जुनून रखने वाले भारत और पाकिस्तान देश में एक और बड़ी समानता है, वो है
महिलाओं का हक़ और शादी के अन्तर्गत पत्नी से बलात्कार का मुद्दा।दोनों देशों में
औरतों के हक़ के मुद्दे पर भारी विरोध है खासकर शादी के बाद अपने पत्नी से
बलात्कार और सुरक्षा के हक़ के मुद्दे पर।इसके लिए पारिवारिक व्यवस्था के ख़त्म
होने का हवाला दिया जाता है। जनवरी 2013 में जब जे एस वर्मा समिति ने आपराधिक
कानून में संशोधन पर अपनी रिपोर्ट दी तो उसमें इस बात कि पहल की गई किं भारत में
पत्नी से बलात्कार भी कानून के दायरे में आना चाहिए। लेकिन संसद के पैनल ने कहा कि
अगर बीवी से बलात्कार के मुद्दे को कानून में लाया जाता है तो पूरी पारिवारिक
व्यवस्था दबाव में आ जाएगी। इसी बात पर गृह राज्य मंत्री हरिभाई चौधरी ने कहा कि
ऐसी अनुशंसा के माध्यम से हो सकता है कि समाज में अन्याय फैल जाए। महिला एवं बाल
विकास मंत्री मेनका गांधी ने कहा किं पत्नी से बलात्कार भारत में अपराध की श्रेणी
में नहीं आ सकता है क्योंकि इसके लिए शिक्षा और अशिक्षा का स्तर ,ग़रिबी, समाजिक
रीति रिवाज और धार्मिक विश्वास जिम्मेदार है। उन्होने कहा कि ऐसा समाज किं उस
मानसिकता के कारण होता है जो शादी को एक संस्कार मानते हैं।वर्तमान कानून (भारतीय
दंड संहिता 1860 की धारा 375) के मुताबिक, किसी पुरूष द्वारा पत्नी, जिसकी उम्र 15
साल से कम ना हो, के साथ यौन संबंध बनाना बलात्कार नहीं है।संयुक्त राष्ट्र
प़ॉपुलेशन फ़ड के मुताबिक भारत में 75 फीसदी विवाहित महिलाओं के पति उनका बलात्कार
करते हैं।उल्लेखनीय है किं 125 देशों में यौन उत्पीड़न, 119 देशों में घरेलू हिंसा
और केवल 52 देशों में पति के बलात्कार किए जाने के खिलाफ कानून है।हालांकि तत्काल
में कई देशों में पत्नी के साथ ज़बरदस्ती यौन संबंध को अपराध के श्रेणी में रखा
गया है।मलेशिया ने 2007,तुर्की ने 2005 और बोलीविया ने 2013 में इस कानून को
अपनाया।संयुक्त राज्य अमरीका में ये 1970 में ही लागू हो गया था। वहीं यूरोपिय
देशों ने इस कानून को 90 के दशक में अपनाया। ब्रिटेन में 1991 में पति के बलात्कार
करने को गैर कानूनी घोषित किया गया। लेकिन भारत,चीन,सऊदी अरब, अफगानिस्तान और
पाकिस्तान उन 49 देशों में शामिल हैं जहां महिलाओं का हक और उनका अधिकार एक अभिशाप
बना हुआ है।भारत में पुरूष अधिकार कार्यकर्ता इस कानून का विरोध कर रहें हैं। वो
इसे कमजोर पुरूषों के कानूनी अधिकारों को दबाने के प्रयास के रूप में देख रहें
हैं।
सामाजिक आईना
Friday, 8 June 2018
Wednesday, 16 November 2016
Sunday, 14 August 2016
मेरा भारत महान........
अभी भी याद है वो
दिन जब हम अपनी कक्षा में अक्सर “मेरा भारत महान” पर निबंध लिखा करते थे। वो दिन याद करके चेहरे पर मुस्कान
आ जाती है जब हम 15 अगस्त और 26 जनवरी को स्कूल इसलिए जाते थे क्योंकि मिठाई बंटती
थी.। तब हमारी स्वतंत्रता ही देश की आजादी हुआ करती थी। इन सब के बावजूद भी तब
हमारी देशभक्ती और देशप्रेम में ज्यादे पारदर्शीता थी, क्योंकि तब हम दुनिया के
रस्मों-रिवाजों से अंजान थे। होली हो या मुहर्म, दिपावली हो या ईद हमें समान खुशी होती
थी क्योकिं हमें दोनों त्योहारों पर छुट्टी मिलती थी। तब हमारा ना कोई धर्म होता
था और ना ही मज़हब, जो मिलता उसी के साथ खेल लिया करते थे। अब हम बड़े हो गए समाज
के रस्मों-रिवाज में बंध गए। बचपन के उस निस्वार्थ भाव कि जगह अब सामाजिक
विसंगतियों ने ले ली।हमारे विचारों को आडम्बर और विडम्बनाओं की बेड़ियों ने जकड़
लिया। आज मानवता और देशभक्ती केवल दो जगह देखने को मिलती है,एक क्रिकेट के मैदान
में और हमारे राजनेताओं की भाषणों में। इस महान देश की एकता और अखंण्डता कहीं गुम
सी हो गयी है “वतन की जो हालत सुनाने लगेंगे तो पत्थर भी आंसू बहाने लगेंगे कहीं भीड़ में खो
गयी आदमीयत इसे ढ़ुढ़ने में ज़माने लगेंगे”। आज ज़रूरत है तो हमें अपने अन्दर गुम हो चुकी
उस आदमीयत को ढ़ुढ़ने की, आजादी के बाद भी जकड़े इन बेड़ियों से मुक्त होने की। देश को महान बनाने
के लिए पहले खुद को और अपने समाज को निखारने की ज़रूरत है। तब जा कर कहीं हमारा
भारत महान होगा।
Tuesday, 29 September 2015
सामाजिक आईना: कुछ इस पहर कुछ उस पहर
सामाजिक आईना: कुछ इस पहर कुछ उस पहर: संघर्ष पथ पर मैं चला लेकर सपनों का शहर, मुश्किलें आई डगर पर कुछ इस पहर कुछ उस पहर........ ( कल पढ़े पूरी कविता ) ...
कुछ इस पहर कुछ उस पहर
संघर्ष पथ पर मैं चला लेकर सपनों का शहर,
मुश्किलें आई डगर पर कुछ इस पहर कुछ उस पहर........
( कल पढ़े पूरी कविता )
मुश्किलें आई डगर पर कुछ इस पहर कुछ उस पहर........
( कल पढ़े पूरी कविता )
अनुरोध
इस तरह की और भी सामाजिक और राजनीतिक कवितोएं पढ़ने के लिए पढ़े मेरी आने वाली किताब "बेबाक़ी"...
Thursday, 24 September 2015
अच्छी लगती है...
बैठ जाता हूं अक्सर ज़मीन पर मैं,
क्योंकिं मुझे मेरी औकात अच्छी लगती है।
खा लेता हूं अक्सर रोटी और दाल मैं,
क्योंकिं मुझे मेरी पुरानी यादें अच्छी लगती है।
भींग लेता हूं अक्सर बारिश में मैं,
क्योंकिं मुझे सावन की फुहारें अच्छी लगती है।
ठहर जाता हूं अक्सर फुलों पर मैं ,
क्योंकिं मुझे महकती हवाऐं अच्छी लगती हैं।
देख लेता हूं अक्सर आसमान की तरफ मैं,
क्योंकिं मुझे चिड़ियों की चह-चहाटें अच्छी लगती हैं।
सहम जाता हूं अक्सर ख्यालों में मैं,
क्योंकिं मुझे वो बचपन की बातें अच्छी लगती हैं।।
क्योंकिं मुझे मेरी औकात अच्छी लगती है।
खा लेता हूं अक्सर रोटी और दाल मैं,
क्योंकिं मुझे मेरी पुरानी यादें अच्छी लगती है।
भींग लेता हूं अक्सर बारिश में मैं,
क्योंकिं मुझे सावन की फुहारें अच्छी लगती है।
ठहर जाता हूं अक्सर फुलों पर मैं ,
क्योंकिं मुझे महकती हवाऐं अच्छी लगती हैं।
देख लेता हूं अक्सर आसमान की तरफ मैं,
क्योंकिं मुझे चिड़ियों की चह-चहाटें अच्छी लगती हैं।
सहम जाता हूं अक्सर ख्यालों में मैं,
क्योंकिं मुझे वो बचपन की बातें अच्छी लगती हैं।।
Subscribe to:
Posts (Atom)