Tuesday, 29 September 2015
सामाजिक आईना: कुछ इस पहर कुछ उस पहर
सामाजिक आईना: कुछ इस पहर कुछ उस पहर: संघर्ष पथ पर मैं चला लेकर सपनों का शहर, मुश्किलें आई डगर पर कुछ इस पहर कुछ उस पहर........ ( कल पढ़े पूरी कविता ) ...
कुछ इस पहर कुछ उस पहर
संघर्ष पथ पर मैं चला लेकर सपनों का शहर,
मुश्किलें आई डगर पर कुछ इस पहर कुछ उस पहर........
( कल पढ़े पूरी कविता )
मुश्किलें आई डगर पर कुछ इस पहर कुछ उस पहर........
( कल पढ़े पूरी कविता )
अनुरोध
इस तरह की और भी सामाजिक और राजनीतिक कवितोएं पढ़ने के लिए पढ़े मेरी आने वाली किताब "बेबाक़ी"...
Thursday, 24 September 2015
अच्छी लगती है...
बैठ जाता हूं अक्सर ज़मीन पर मैं,
क्योंकिं मुझे मेरी औकात अच्छी लगती है।
खा लेता हूं अक्सर रोटी और दाल मैं,
क्योंकिं मुझे मेरी पुरानी यादें अच्छी लगती है।
भींग लेता हूं अक्सर बारिश में मैं,
क्योंकिं मुझे सावन की फुहारें अच्छी लगती है।
ठहर जाता हूं अक्सर फुलों पर मैं ,
क्योंकिं मुझे महकती हवाऐं अच्छी लगती हैं।
देख लेता हूं अक्सर आसमान की तरफ मैं,
क्योंकिं मुझे चिड़ियों की चह-चहाटें अच्छी लगती हैं।
सहम जाता हूं अक्सर ख्यालों में मैं,
क्योंकिं मुझे वो बचपन की बातें अच्छी लगती हैं।।
क्योंकिं मुझे मेरी औकात अच्छी लगती है।
खा लेता हूं अक्सर रोटी और दाल मैं,
क्योंकिं मुझे मेरी पुरानी यादें अच्छी लगती है।
भींग लेता हूं अक्सर बारिश में मैं,
क्योंकिं मुझे सावन की फुहारें अच्छी लगती है।
ठहर जाता हूं अक्सर फुलों पर मैं ,
क्योंकिं मुझे महकती हवाऐं अच्छी लगती हैं।
देख लेता हूं अक्सर आसमान की तरफ मैं,
क्योंकिं मुझे चिड़ियों की चह-चहाटें अच्छी लगती हैं।
सहम जाता हूं अक्सर ख्यालों में मैं,
क्योंकिं मुझे वो बचपन की बातें अच्छी लगती हैं।।
सामाजिक आईना: बचपन का एहसास
सामाजिक आईना: बचपन का एहसास: मत भूल वो शहर वो गांव वो मिट्टी, जिसपर खेल-खेल में हमने सपनों का महल बनाया था। मत भूल वो इन्सान वो हाथ वो कन्ध...
बचपन का एहसास
मत भूल वो शहर वो गांव वो मिट्टी,
जिसपर खेल-खेल में हमने सपनों का महल बनाया था।
मत भूल वो इन्सान वो हाथ वो कन्धा,
जिस पर बैठा कर पापा ने हमें मेला दिखाया था।
मत भूल वो साड़ी वो पल्लू वो आंचल,
सहम जाने पर जिसमें मां ने लोरी गा कर सुलाया था।
अब खो चुका है वो समय वो पल वो बचपन,
जब चोट लगने पर हमें मां ने अपनी नम आंखों से गले लगाया था।
बहुत याद आता है वो चमन वो फूल वो खुश्बू,
भूख लगने पर हमें जब मां ने अपने हाथों से रोटी खिलाया था।।
जिसपर खेल-खेल में हमने सपनों का महल बनाया था।
मत भूल वो इन्सान वो हाथ वो कन्धा,
जिस पर बैठा कर पापा ने हमें मेला दिखाया था।
मत भूल वो साड़ी वो पल्लू वो आंचल,
सहम जाने पर जिसमें मां ने लोरी गा कर सुलाया था।
अब खो चुका है वो समय वो पल वो बचपन,
जब चोट लगने पर हमें मां ने अपनी नम आंखों से गले लगाया था।
बहुत याद आता है वो चमन वो फूल वो खुश्बू,
भूख लगने पर हमें जब मां ने अपने हाथों से रोटी खिलाया था।।
Tuesday, 22 September 2015
सामाजिक आईना: चंद सच्चाईयां
सामाजिक आईना: चंद सच्चाईयां: खुली अॉख जब अंधेरी रात के बाद, नयी किरणों के संग बीेते लम्हों की बेड़ीयों को तोड़ दिया। उम्रभर लड़ते ...
चंद सच्चाईयां
खुली अॉख जब अंधेरी रात के बाद,
नयी किरणों के संग बीेते लम्हों की बेड़ीयों को तोड़ दिया।
उम्रभर लड़ते रहे ज़िंदगी के जिस जद्दोज़हद में,
उन नामुराद लहरों से अपनी कश्तियों को मोड़ लिया।
टुकड़ों में बिखरी ज़िंदगी की खुशी के पल-पल को,
मोतियों की तरह धागे में पिरो कर जोड़ लिया।
ना चाहत थी जिस ग़में उल्फ़त की हमें,
कैद करके उन्हें हुज़रे में अपना रिश्ता तोड़ लिया।
कोई बेबसी भी आई थी मुझे आजमाने सफ़र के मुहोने पर,
रौंद कर जिन्हें मैं अपने पैरों से कारवां संजो लिया।
तहज़ीब हमें भी थी लोगों से तारूफ होने की,
अभी चॅद सच्चाईयां ही रखी थी सामने कि लोगों ने हमसे अपना मुंह मोड़ लिया।।
नयी किरणों के संग बीेते लम्हों की बेड़ीयों को तोड़ दिया।
उम्रभर लड़ते रहे ज़िंदगी के जिस जद्दोज़हद में,
उन नामुराद लहरों से अपनी कश्तियों को मोड़ लिया।
टुकड़ों में बिखरी ज़िंदगी की खुशी के पल-पल को,
मोतियों की तरह धागे में पिरो कर जोड़ लिया।
ना चाहत थी जिस ग़में उल्फ़त की हमें,
कैद करके उन्हें हुज़रे में अपना रिश्ता तोड़ लिया।
कोई बेबसी भी आई थी मुझे आजमाने सफ़र के मुहोने पर,
रौंद कर जिन्हें मैं अपने पैरों से कारवां संजो लिया।
तहज़ीब हमें भी थी लोगों से तारूफ होने की,
अभी चॅद सच्चाईयां ही रखी थी सामने कि लोगों ने हमसे अपना मुंह मोड़ लिया।।
Monday, 21 September 2015
हम और वो
हम सहते रहे वो सताते रहे,
हम सुनते रहे वो सुनाते रहे।
हम सुनते रहे वो सुनाते रहे।
गम तो बहुत थे जिन्दगी में मगर
देख कर सूरत उनकी हम वादा निभाते रहे।।
हर बार नयी थी बातें उनकी,
हर बार वही थीं जज़्बातें उनकी।
वो हमें मूर्ख समझ कर बहलाते रहे,
हम इसे देश की तरक्की मान कर अपनाते रहे।।
हर बार वही थीं जज़्बातें उनकी।
वो हमें मूर्ख समझ कर बहलाते रहे,
हम इसे देश की तरक्की मान कर अपनाते रहे।।
मेरी चाहत
है इरादा की ऐसा कुछ कर जॉऊं मैं,
बनकर फूल पूरे चमन को महकाऊॅ मैं।
है हौसला ऐसा कुछ दिखलाऊं मैं,
जलकर आग में धुएॅ की तरह आसमान में छा जाऊं मैं।
ना अभिमान हो रोशनी की मुझे,
बनकर चॉद जमाने को चमकाऊॅ मैं।
है ये चाहत मेरा ना घर-बार हो,
मिले प्यार जहॉ वहीं बस जाऊं मैं।।
Sunday, 20 September 2015
गांधी याद आ रहे हैं
गांधी याद आ रहे है...
भूला नहीं हूं मै अभी तक,
आपका पिछला वादा।
आए हो फिर द्वार हमारे,
बता दो अपना इरादा।।
हो गए मशगूल आप तो,
कुर्सी को हथियाने में।
वो भी बाहर ऐश कर रहा,
जिसको होना चाहिए थाने में।।
नाम तुम्हारा अंकित है अब,
देश के रखवालों में।
तुम अभियान चलाते रह गए,
नदियां मिल गई नालों में।।
शिलान्यास तो बहुत किया,
अब तो तुम कुछ काम करो।
तुमसे जनता की उम्मीद जुड़ी है,
इसका तो कुछ मान करो।।
देश के विकास पर अब तो,
काले बादल छा रहे है।
वक्त के इस हालात से हमें,
गांधी याद आ रहे हैं।
भूला नहीं हूं मै अभी तक,
आपका पिछला वादा।
आए हो फिर द्वार हमारे,
बता दो अपना इरादा।।
हो गए मशगूल आप तो,
कुर्सी को हथियाने में।
वो भी बाहर ऐश कर रहा,
जिसको होना चाहिए थाने में।।
नाम तुम्हारा अंकित है अब,
देश के रखवालों में।
तुम अभियान चलाते रह गए,
नदियां मिल गई नालों में।।
शिलान्यास तो बहुत किया,
अब तो तुम कुछ काम करो।
तुमसे जनता की उम्मीद जुड़ी है,
इसका तो कुछ मान करो।।
देश के विकास पर अब तो,
काले बादल छा रहे है।
वक्त के इस हालात से हमें,
गांधी याद आ रहे हैं।
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