Thursday, 24 September 2015

अच्छी लगती है...

 बैठ जाता हूं अक्सर ज़मीन पर मैं,
क्योंकिं  मुझे मेरी औकात अच्छी लगती है।
खा लेता हूं अक्सर रोटी और दाल मैं,
क्योंकिं मुझे मेरी पुरानी यादें अच्छी लगती है।
भींग लेता हूं अक्सर बारिश में मैं,
क्योंकिं मुझे सावन की फुहारें अच्छी लगती है।
ठहर जाता हूं अक्सर फुलों पर मैं ,
क्योंकिं मुझे महकती हवाऐं अच्छी लगती हैं।
देख लेता हूं अक्सर आसमान की तरफ मैं,
क्योंकिं मुझे चिड़ियों  की चह-चहाटें अच्छी लगती हैं।
सहम जाता हूं अक्सर ख्यालों में मैं,
क्योंकिं मुझे वो बचपन की बातें अच्छी लगती हैं।।  

1 comment: